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Shoojit Sircar's PINK Bollywood Movie Review

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"पिंक" एक घटना है-- मग़र एक ऐसी घटना जो रोज़ अपना क्षेत्र बदल कर देश-विदेश में कहीं न कहीं घटती रहती है ! "पिंक" एक त्रासदी है-- जो हर वर्ग और समाज की स्त्री को झेलना पड़ता है ! "पिंक" एक कहाँनी है-- जो आदमी और इन्सान जे बीच की लकीर खिंचती है ! "पिंक" एक विद्रोह है-- जो शरीर के बल को आत्मा के बल से ऊपर रखने को अस्वीकार करता है ! "पिंक" एक उम्मीद है-- जो स्त्री-पुरुष भेद से ऊपर उठते समाज की अगवानी करती है ! "पिंक" एक फ़लसफ़ा है-- जो इच्छा और अनिच्छा की गहरी मीमांशा करती है ! "पिंक" एक संदेश है-- जो "चरित्र" की परिभाषा का मूल्यांकन करने की इच्छा देता है ! "पिंक" एक "नहीं" को "नहीं" समझने की ऐसी शानदार नसीहत है जिसे "हाँ" कहने को दिल करता है !! "अमिताभ बच्चन कितने प्रभावशाली और वास्तविक हो सकते हैं । पिंक उसका उदहारण है । उनकी आँखे, उनका संवाद, उनका हाव भाव, उनकी झुर्रियां और उनकी बेचैनी सब मिल कर ये साबित करती हैं कि क्यों श्री बच्चन सदी के महानायक है...

"क़िरदारे-आसिफ़"

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अच्छी बात है....! हाँ ! यही एक जुमला था..जो वो अक्सर दुहराते थे... कोई भी दौर हो कोई भी मौक़ा हो कोई भी शख्स..उन्हें उसमें एक न एक अच्छी बात मिल ही जाती थी...जैसे हँस को नीर में क्षीर.. ! आँखों पर मोटा ऐनक... जैसे आसमान झलकाता दरीचा..सर पर शायराना टोपी..जैसे किसी फीक्रमन्द-पहाड़ की पुरअसरार चोटी..ज़रा सा झुकती रीढ़..जैसे नीम-सिज़दा किये कोई मोनिन..या अल्लाह की शान-ओ-अदब सर झुकाए कोई शरीफ़ बन्दा..जिसके हाथ में एक श्मशीरे-हक़ ... सूरते-क़लम लहराती जाती..हाँ ! कभी कभी ये इश्क़ के फूलों से भरपूर कोई नाज़ुक टहनी भी बन जाती..और फ़िज़ाओं में ग़ज़ल महकने लगती...!....उनकी आवाज़ में जंगली शेर की दहाड़ थी तो उमर ख्यायम की रुबाइयों में गूँजते रावाब का सोज़ भी था..सच की आवाज़ ऐसी ही होती है..! "हंगामा-हस्ती से अलग गोशा-नाशिनो/बेसूद रियाज़त का सिला माँग रहे हो..".... अपने वक़्त...अपने समाज को ख़ुद-मुख्तारी और मेहनत का सबक देने से पहले उन्होंने उसे अपनी ज़िंदगी में ढाला...वो ता'उम्र मेहनतकश रहे और दिलदार भी...उन्हें वक़्त ने कई थपेड़े दिए..दर्द दिए...बीमारियाँ दीं... लेकिन वो बस ये कह कर हँस देते.."च...

उरी पर आतंकी हमले पर

उन लोगों की उम्र अभी मरने की तो नहीं थी  न ये वो जंग थी  जिसमे उनकी कुर्बानी होती  न ये दुर्घटना थी कोई  जिसे समाचार बनना था...  ये तो एक धोखा था  जैसे सोए शेर पर लकड़बग्घों का झुंड घात लगा कर हमला कर दे और नोच डाले ! ये तो ख़ौफ़ज़दा कुत्तों के धोख़े से काट लेने जैसा वाकया था ! या नाली के रास्ते आए साँपों का डसना / क्या पता साँप आस्तीन में ही हो ! मग़र इतना तो हुआ की सत्रह जवान जो अभी सत्तर साल तक सीना चौड़ा किये ज़िन्दा रहते अचानक से "क़त्ल" कर दिए गए ! तुम्हारा ख़ून भारत के ललाट पे तिलक बन कर दमक रहा है ! तुम्हारा ख़ून भारत की आँखों में उबल कर उतर रहा है ! तुम्हारा ख़ून भारत की नसों में ख़ौल रहा है / और ये कह रहा है --  हमे बदला नहीं चाहिए "इन्साफ़" चाहिए और आसमानी-किताबों में लिक्खा है "ख़ून का बदला ख़ून यही इन्साफ़ है" !! ओमा The अक् 19 sep 2016

"Hum Bharat Hain" seminar in DALIMSS

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On the 70th anniversary of our "Democratic Bharat", AKK Jagrit Matdaata Manch in association with DALIMSS School organised a seminar on our movement "Hum Bharat Hain". Senior Students of the school participated in the seminar with full enthusiasm. Vishal Bharat opened the seminar with his speech on the need to be "Bharat". He said that in the era, where people are joining many political organisations in the name of being a nationalist & those parties are using them to gain political benefit are misleading, there is a desparate need for people to become "Bharat" and join the "Hum Bharat Hain" Movement. Hitesh AKK said on the occasion that this is the time when fellow citizens have to realise when they are being used by such parties and think together as "Bharat". This, one-directional thinking is the only option to bring back our Unity in Diversity. Saqib Bharat urged the students to drop their surnames giv...

सैकड़ों हिन्दू मुस्लिम बन्धुओं ने जाती-मज़हब की पहचान छोड़ कर अपना उपनाम भारत जोड़ कर मनाया जश्ने-आज़ादी

काशी " देश के लोकतंत्र को समर्पित संस्था "अक् जागृत मतदाता मंच" द्वारा प्रधान मंत्री के आह्वान पर देश की आज़ादी के 70वें साल पर मनाए जा रहे जश्ने-आज़ादी के अंतर्गत अक् के अभियान ऐलान करो हम भारत हैं  के चौथे वर्ष् पर जैतपुरा शाखा का उद्घाटन किया गया जहाँ सैकड़ो मुस्लिम बन्धुओं ने और कई हिन्दू भाइयों ने साकिब भारत के नेतृत्व में अपने उपनाम त्याग कर उसके स्थान पर "भारत" लगाया और भारत को किसी भी जात या मज़हब से ऊपर रख कर लोकतंत्र को मजबूत करने का वचन दिया । इस अवसर पर मुख्य वक्ता के तौर पर बोलते हुए स्वामी ओमा दी अक् ने कहा कि भारत को जनतंत्र की स्वतंत्रता प्राप्त हुए उनहत्तर साल बीत चुके हैं लेकिन अब तक भारत अपनी क्षमता के अनुसार विकास और वैभव नहीं प्राप्त कर सका है, सनातन धर्म के प्राकट्य और मानव कल्याण का उद्घोष करने वाले भारत में आज जिस तरह का चारित्रिक-सामाजिक-पतन देखने को मिल रहा है उसके पीछे आध्यत्मिक-दरिद्रता और देशप्रेम की कमी है जिसे सरकारी तौर पर पिछले कई सालों में अनदेखा किया गया है लेकिन अब थोड़ी सी उम्मीद जाग रही है। उन्होंने आगे कहा कि केवल सेक्युलरवा...

Mohenjo-Daro Film Review

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"ना जाने कब ये मुम्बईया-फ़िल्मकार इतिहास से बालात्कार बंद करंगे ! 50-60 के दशक में जब धन और तकनीक की बहुत कमी थी तब हिन्दी-सिनेमा में यदि ऐतिहासिक-फिल्मो में इतिहास की झलक कम आती थी तो वो क्षम्य हो सकती है , किन्तु आज जब "इण्डियन-फ़िल्म-इंड्रस्टी" विशुद्ध मुनाफ़ाख़ोर-व्यापारियों का अड्डा बन चुकी है ऐसे में जब सैकङो करोड़ उड़ा कर भी  एक वाहियात और मसालेदार सिनेमा को ईतिहास के नाम पर परोसा जाता है तो बहुत रोष होता है । अभी "बाजिराओ-मस्तानी" की तक़लीफ़ मिटी भी नहीं थी कि "जोधा-अक़बर" जैसी नौटंकी बनाने वाले "आशुतोष गोवरेकर" ने एक नया तमाशा परोसा है "मोहेनजो दारो" (वैसे हिंदी के अनुसार इसे "मोहन जोदड़ो" होना चाहिए था) । इस फ़िल्म में बहुत कुछ है बड़े स्टार (हृतिक रोशन,कबीर बेदी), बड़ा संगीतकार (ए आर रहमान), बड़ा गीतकार (ज़ावेद अख़्तर) , मादक अभिनेत्री,बड़े बड़े सेट, इफ़ेक्ट, नाच-गाना, बड़ा बैनर...सब कुछ...बस नहीं है तो -- सार्थक कहाँनी, उस युग को छूता मधुर संगीत, समझ में आने और दिल में उतरने वाले गीत, प्रभावशाली अभिनय और इतिहास को उभार सकने व...

Hiroshima

                   "हिरोशिमा"..... " चमकती रात तो उस रात भी वैसी सुकूँ की थी   हज़ारों साल से जैसे वो आती थी / सुलाती थी   मुलायम अब्र की कम्बल लपेटे चाँद लेटा था   कोई मासूम अफ़साना सुनता था सितारों को   बिना किस्से के सन्नाटी सी रातें कौन काटेगा   कहीं पर दूब के झुरमट में झींगुर गुनगुनाते थे   मुसल्सल रात भर, पाज़ेब जैसे छमछमाते थे   खिले थे रात में जो फूल / उनकी खुशबुएँ भीनी   हवा के पर पकड़ कर शहर के भीतर टहलती थीं   शहर जिसमे कई जोड़े मचलते छेड़ करते थे    कई बूढ़ी कराहें नींद को रह रह बुलाती थीं    कई बच्चे पकड़ कर हाथ माँ का/ मस्त सोए थे    कोई भी निगहबानी इससे बेहतर मिल नहीं सकती    ये छोटा सा शहर तस्वीर सा लगता था इस शब् भी ...   सुबह सूरज हटा कर कोहरा कोहरा नर्म पर्दों को   सजाए धुप की थाली फ़लक़ से नीचे उतरा था   हरे तालाब में हल्के गुलाबी से कँवल फूले ...