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बेदाग-धब्बे

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बेदाग-धब्बे --------------- "कोई भी राष्ट्र तीन "ध" पर जीवित रहता है-- "धर्म" "धन" और "ध्येय"..!"-- The अक् "प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की छवि बेदाग है!".... यह वाक्य कितना मनोहर है... जैसे मनोहर होते है समुद्र में तैरते "जेली फिश" के समूह... पर अध्ययन बताता है यह सुन्दर समूह समुद्र के सबसे जहरीले अंग हैं..!"  नरेंद्र मोदी की अभूतपूर्व लोकप्रियता और बहुमत भारत में एक अद्भुत "प्रतिक्रियात्मक-क्रांति" के रूप में समझी जानी चाहिए... यह उस समय के सत्तारूढ़ दल और उसके संवाहकों द्वारा "प्रोग्रेसिव" होने के नाम पर "हिन्दू-संस्कृति का अपमान" और बहूसंख्यक-जनता को हाशिये पर डालने के कुत्सित-प्रयास का परिणाम था... कुल मिला कर मेरे देखे यह "तथाकथित-विज्ञानवाद" और "छद्म-सेक्युलरिज्म" का मुंह तोड़ लोकतांत्रिक-जवाब भर था... घृणा से उभरी प्रतिघृणा की वह लहर जिस पर सत्ता की नाव ले कर नरेंद्र मोदी का भारत की केंद्रीय राजनीति में प्रवेश हुआ वो कदाचित "आर्क ऑफ नोहा...

एकला चलो रे... (बुद्ध और सिकंदर) - ओमा द अक्

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एकला चलो रे... (बुद्ध और सिकंदर ) ------------- "उत्तर दिशा के क्षितिज पर गोधूलि की रक्तिम आभा शनै-शनै धूमिल हो रही थी... काले- सँवलाये-आकाश में अटल-ध्रुव प्रकट होने को था... उस अटल-यथार्थ का उद्घोष करने... जो संसार मे आने वाले प्रत्येक जीव के समक्ष एक न एक दिन आता है-- "मरण"-- सम्प्रति! इसी अटल-ध्रुव से शीश-जोड़े तथागत लेटे हुए थे... सांसारिक-लोगों के लिए यूँ लेटना अशुभ है पर सन्यासी को तो यूँही मंगल-बोध होता है... निकट में मुड़-मुंडाए-भिक्खुओं का समूह निःशब्द देख रहा था... उस गौतम के परिनिर्वाण को जो संसार के विज्ञान का महानतम-उद्घोषक है... उस बुद्ध को जिसके पदचिह्न दुःख से मुक्ति की ओर लिए जाते हैं... आज वह स्वयम जा रहा है... किन्तु कैसा शांत और संयमित.. मानो कोई मनचाही यात्रा पर निकल रहा हो... अहोभाग्य! क्या मृत्यु इतनी सरल और सुंदर भी होती है...? यूनान की एक छोटी सी सल्तनत "मकदूनिया" में आज शाम बड़ी रंगीली थी... चाँद अपने पूरे शबाब पर था... जो अपनी चाँदनी के जाल फेंक कर आसमान के तमाम-सितारों को गुमशुदा किये जा रहा था... बस दूर एक सितारा उत...