Friday, 23 September 2016

Shoojit Sircar's PINK Bollywood Movie Review

"पिंक" एक घटना है-- मग़र एक ऐसी घटना जो रोज़ अपना क्षेत्र बदल कर देश-विदेश में कहीं न कहीं घटती रहती है !

"पिंक" एक त्रासदी है-- जो हर वर्ग और समाज की स्त्री को झेलना पड़ता है !

"पिंक" एक कहाँनी है-- जो आदमी और इन्सान जे बीच की लकीर खिंचती है !

"पिंक" एक विद्रोह है-- जो शरीर के बल को आत्मा के बल से ऊपर रखने को अस्वीकार करता है !

"पिंक" एक उम्मीद है-- जो स्त्री-पुरुष भेद से ऊपर उठते समाज की अगवानी करती है !

"पिंक" एक फ़लसफ़ा है-- जो इच्छा और अनिच्छा की गहरी मीमांशा करती है !

"पिंक" एक संदेश है-- जो "चरित्र" की परिभाषा का मूल्यांकन करने की इच्छा देता है !

"पिंक" एक "नहीं" को "नहीं" समझने की ऐसी शानदार नसीहत है जिसे "हाँ" कहने को दिल करता है !!

"अमिताभ बच्चन कितने प्रभावशाली और वास्तविक हो सकते हैं । पिंक उसका उदहारण है । उनकी आँखे, उनका संवाद, उनका हाव भाव, उनकी झुर्रियां और उनकी बेचैनी सब मिल कर ये साबित करती हैं कि क्यों श्री बच्चन सदी के महानायक हैं ।। "

"सरकार की "सिनेमाई सोच" में परिपक्वता है  (यद्यपि उन पर वामपंथी प्रभाव है लेकिन सुगढ़) । वो कहाँनी को "पूरा" सुनाते हैं और एक एक फ्रेम पर काम करते हैं । वि शांता राम और मनोज कुमार के बाद सरकार की फिल्म्स में "सिंबल्स" बड़े बेहतरीन ढंग से इस्तेमाल होते हैं (जैसे बच्चन का मास्क) ।। सरकार ने एक विश्वस्तरीय सिनेमा दिया है इसके लिए बधाई ।। "

"पिंक का स्क्रीनप्ले लाजवाब है और एक बराबर है । सिनेमा आपको बाँधे रखता है (हाँ कुछ लोग जो मसाला देखते हैं उन्हें नहीं) । फिल्म का पार्श्व संगीत कहाँनी को गहरा करता है । हाँ ! फिल्म की मुख्य अभिनेत्री का अभिनय बहुत साधारण और कहीं कहीं निम्न है जिसकी वज़ह से कई सीन अपना वज़न गंवा देते हैं सरकार इस फिल्म में और अच्छी "अभिनेत्री" को ले कर कमाल कर सकते थे , ख़ैर ।।"

"No" ये नो "पिंक" में इस्तेमाल बेशुमार-अंग्रेजी के लिए जो इसके "हिंदी" सिनेमा होने पर संदेह पैदा करता है । और देश के एक बड़े हिस्से से काट देता है (अन्यथा ये फिल्म सप्ताह भर में 70 करोण कमाई करती) । पता नहीं आज कल के तथाकथित हिंदी सिनेमा वालों को अँग्रेजी बोलने का और उसीके माध्यम से आधुनिकता,प्रगतिशीलता और वास्तविकता दिखाने का भरम बढ़ता जा रहा है, हिंदी-सिनेमा में ये प्रयोग बेहद घातक परिणाम देने वाला सिद्ध होगा । "भाषा किसी सिनेमा का चरित्र गढ़ती है न की चरित्र की भाषा सिनेमा का " । हॉलीवुड में तमाम ऐसी फिल्म्स हैं जिनमें ग़ैर अंग्रेजी के चरित्र होते हैं लेकिन वो अंग्रेजी बोलते हैं अथवा सबटाइटल्स का प्रयोग होता है । लेकिन हिन्दी सिनेमा वालों को या तो "भाषाई-समरूपता" का कोई ज्ञान नहीं । या किसी षड्यंत्र के अंतर्गत अब "हिन्दी सिनेमा" को "हिंगलिश-सिनेमा" में बदलने की कोशिश हो रही है..जिसके लिए हर सिनेमा प्रेमी का "नहीं" होना चाहिए .. ख़ैर !

"पिंक" एक ऐसी  फिल्म है जिसे पूरे हिन्दोस्तान को देखना चाहिए और स्त्री-पुरुषों को साथ बैठ कर देखना चाहिए । भाइयो को अपनी बहनों के साथ/पतियों को अपनी पत्नियों के साथ/प्रेमियों को प्रेमिकाओं के साथ और बेटों को अपनी माँओं के साथ.. "क्यों की 'नहीं' केवल सेक्स के सन्दर्भ में ही नहीं जीवन के कई सन्दर्भों में 'नहीं' ही कहलाएगा ..।।

स्वामी ओमा The अक्
23 सितम्बर 2016

Thursday, 22 September 2016

"क़िरदारे-आसिफ़"

अच्छी बात है....! हाँ ! यही एक जुमला था..जो वो अक्सर दुहराते थे... कोई भी दौर हो कोई भी मौक़ा हो कोई भी शख्स..उन्हें उसमें एक न एक अच्छी बात मिल ही जाती थी...जैसे हँस को नीर में क्षीर.. !
आँखों पर मोटा ऐनक... जैसे आसमान झलकाता दरीचा..सर पर शायराना टोपी..जैसे किसी फीक्रमन्द-पहाड़ की पुरअसरार चोटी..ज़रा सा झुकती रीढ़..जैसे नीम-सिज़दा किये कोई मोनिन..या अल्लाह की शान-ओ-अदब सर झुकाए कोई शरीफ़ बन्दा..जिसके हाथ में एक श्मशीरे-हक़ ... सूरते-क़लम लहराती जाती..हाँ ! कभी कभी ये इश्क़ के फूलों से भरपूर कोई नाज़ुक टहनी भी बन जाती..और फ़िज़ाओं में ग़ज़ल महकने लगती...!....उनकी आवाज़ में जंगली शेर की दहाड़ थी तो उमर ख्यायम की रुबाइयों में गूँजते रावाब का सोज़ भी था..सच की आवाज़ ऐसी ही होती है..!
"हंगामा-हस्ती से अलग गोशा-नाशिनो/बेसूद रियाज़त का सिला माँग रहे हो..".... अपने वक़्त...अपने समाज को ख़ुद-मुख्तारी और मेहनत का सबक देने से पहले उन्होंने उसे अपनी ज़िंदगी में ढाला...वो ता'उम्र मेहनतकश रहे और दिलदार भी...उन्हें वक़्त ने कई थपेड़े दिए..दर्द दिए...बीमारियाँ दीं... लेकिन वो बस ये कह कर हँस देते.."चश्मे-साक़ी तो नज़र आती है मैख़ानाबदोश.."...उन्हें किसी से शिक़ायत न थी..न इंसानों से न हैवानों से..न अपनों से न परायों से...न हबीब से न रक़ीब से..न वक़्त से न नसीब से... हाँ ! कोई शिक़वा करते भी तो अपने आप से.."तुम बैठे मुसल्ले पे दुआ माँग रहे हो.."...अपने उस्ताद की बात याद आती उन्हें "ख़ौल आँख/ज़मी देख/फ़लक़ देख/फ़िज़ा देख"...! लेकिन ये शिक़वे भी वक़्ती होते..क्यों की उन्हें ख़ुदा की ज़ात पर इस क़दर यक़ीन था जो उन्हें मायूसी के कुफ़्र से बचाए रखता...!
कहते थे अक्सर वो "मुझे तो शहरे बनारस ने आसमान किया"!....कहते हैं काशी मोक्ष-धाम है जहाँ उत्तरवाहिनी गङ्गा अपने उद्गम की ओर लौट जाने का संदेश लिए बहती रहती है...जिसके किनारे चौरासी घाट.. चौरासी लाख योनियों के भटकाव की गाथा सुनाते हुए..मुक्ति मन्त्र देते हैं..वो भी इसी गङ्गा के सैदाई थे...वो भी इन्ही घाटों के साथ टहलते थे...टहलते टहलते चौरासी-साल बीत गए...अब घाटों की गाथा पूर्ण हो चली थी...अब मोक्ष का मंत्र गुँजने लगा...समय के पत्थरो पर घिसते घिसते शरीर जीर्ण हो चला था... वो अपनी औलादों से पूछ रहे थे--"अरे भाई ! अल्लाह मियाँ हैं कहाँ..!"...सुन कर महादेव मुस्कुरा पड़े...! ...गङ्गा पल भर को ठहर गई...!..घाट मोक्षमंत्र दुहराने लगे... क्षितिज का द्वार खुला... सूरज कि किरणों पर आयत उतरी "इंन्लिल्लाह वः इन्ना लिल्लः राय'जून..!! नसीमे-सुब्ह के हल्के परों बैठ वो दरख्शां-रूह उफ़क़ के पार चली गई...उसके आखरी सवाल का जवाब बाँहें फैलाए सामने खड़ा था...!!...शमा बुझ गई...वो शमा जो बरसों इस हिंदुस्तान की ज़मीन और "क़िरदार साज़ी" की शुआएँ बिखेरती रही..लेकिन सब जानते हैं शमा का बुझना "रौशनी" का बुझना नहीं होता...!

हाँ ! आज उस अज़ीम क़िरदार सुलैमान आसिफ़ का जन्मदिन है जो स्वतंत्रता सेनानी थे..अज़ीम शाइर थे..अदीब थे...उस्ताद थे..देशभक्त थे...हिंदुस्तानी थे... और....
और हाँ ! मेरे सबसे अच्छे दोस्त थे !!

चिराग़े-दैर सुलैमान आसिफ़ के नाम उनके जन्मदिन और "चरित्र निर्माण दिवस " पर...

सप्रेम--
    ओमा The अक्

22 सितम्बर 2016