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"गौरैया" " वो आती थी   जब आँगन में   अपना छोटा कुनबा ले कर   लगता था   दादी-नानी के गाँव से संबंधी आए हैं   जिनको घर के हर कोने पे   बरसों का अधिकार मिला है   जो चाहें वो खा सकते हैं   गा-सकते, सुस्ता-सकते हैं   घर भर में चहका करती थी   अपने नन्हे चूज़े ले कर   रोशनदानों में रहती थी...   अब वो रौशनदान नहीं है   अब मेरे मेहमान नहीं हैं   दादी-नानी गुज़र गईं   अब संबंधों को कौन निभाए   गौरैया अब नज़र न आए   गौरैया अब नज़र न आए .....      " स्वामी ओमा दी अक् "           द्वारा विश्व गौरैया दिवस पर समर्पित नज़्म...                               20/3/2016

रेशनल होने का अर्थ एन्टी नेशनल होना कत्तई नहीं हो सकता-- स्वामी ओमा दी अक्

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काशी, 14 फरवरी 2016 मदर हलीमा सेंट्रल स्कूल (चौहट्टा) में आयोजित एक कार्यक्रम में जे एन यु के मुद्दे पर बोलते हुए स्वामी ओमा दी अक् ने कहा की-- "भारतीय सभ्यता-संस्कृति-समाज और संविधान में मनुष्य की स्वतंत्रता और स्वायत्ता का जितना ध्यान रखा जाता है; विश्व में और कहीं नहीं मिलता..  लेकिन इसी सहिष्णुता और स्वतंत्रता का अनुचित लाभ लेने वाले सत्तालोलुपों की भारी संख्या इस राष्ट्र के तिरंगे वट-वृक्ष में दीमक की तरह लगी है.. कभी मानवता, कभी साम्प्रदायिकता, कभी स्त्री या दलित विमर्श तो कभी अभिव्यक्ति की आज़ादी का नाम ले कर ये तथाकथित "प्रोग्रेसिव-सेकुलर्स" जिन्हें आम ज़ुबान में "वामपंथी" कहा जाता है , अनेक उत्पात मचाते रहते हैं.. अभी शनि मंदिर के नाम पर सनातन धर्म को अपमानित करने का प्रयास थमा भी नहीं था, की भारत का "मस्तिष्क" कहे जाने वाले "जवाहर लाल नेहरु यूनिवर्सिटी" में "शहीद अफज़ल गुरु और कश्मीर की आज़ादी" जैसे "राष्ट्र विरोधी" नारे लगे..  मेरा स्वयम् का अनुभव जे एन यु को ले कर ये है की वहाँ के तमाम वामपंथी संगठन वस्तुतः ...

गणतंत्र दिवस पर “भारतीय गणतंत्र में सहिष्णुता”

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बुर्का या घूंघट का स्त्री के अस्तित्व पे असर

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"इस्लाम" में महिलाओं को हिज़ाब या नक़ाब(बढ़ते बढ़ते बुर्का) पहनना, यक़ीनन ये एक दौर,एक समाज, एक सभ्यता और एक भौगौलिक सिमा की आवश्यकता रही होगी । लेकिन इस्लाम के मूलभूत नियमों (तौहीद) में इसका कोई स्थान नहीं । और सम्प्रदाय या आस्था के मूल को छोड़ कर अन्य सभी बातें समय और स्थान के अनुसार यदि नहीं बदली जाएं तो वरदान से अभिशाप में बदल जाती हैं । जो आज मुस्लिम महिलाओं के साथ हो रहा है / आज के दौर में जब पूरी दुनिया अनियंत्रित रूप से एक वैश्विक गाँव की ओर बह रही है ऐसे में पर्दा प्रथा को बचाना एक बचकानी और मूर्खता पूर्ण कोशिश बन जाती है । आने वाले वक़्त में (यानि 4 दशकों के भीतर) जान संसार पूरी तरह से ग्लोबल हो जाएगा और तकनीक भावनाओं का स्थान घेर लेंगी, सम्प्रदाय जीर्ण और मृत हो जाएंगे ऐसे वक़्त में जब सब सामजिक ढाँचे नष्ट हो जाएंगे उस वक़्त इस प्रथा को याद करके केवल हँसा और रोया जाएगा , हँसी इसलिए की ये मूर्खता कितने बरस ढोई गई, और रोना उन मजलूम, निरीह महिलाओं के जीवन के बारे में सोच कर जो कहने को तो "अशरफुल-मख्लूक़"(श्रेष्टतम जीव) की कतार में पैदा हुईं लेकिन ज़िन्दगी ए...